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तायवान: संतुलन का प्रयास

Published on: November 23rd 2008 20:18:12
चीनी वार्ताकार चेन युनलिन की नवंबर ३-७ की तैपैह यात्रा पर अमरीकी सरकारी अधिकारियों और टीकाकारों में आमतौर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई है। इस दौरान चार समझौतों पर हस्ताक्षर हुये जिनसे सामरिक स्थायित्व में सुधार होगा। इन समझौतों को उद्देश्य आर्थिक और यात्रा संबंधों का विस्तार है। इनसे दोनों पक्षों की सेनाओं में आगे चल कर सहयोग का संकेत भी मिलता है। वाशिंगटन द्वारा इस संपर्क का समर्थन बुश प्रशासन की चीन की क्षत्रीय भूमिका के प्रति अमरीका के व्यवहारिक रवैये का द्यौतक है। फिर भी, जैसा कि हम पहले कह चुके हैं, बेहत्तर त्रिपक्षीय संबंधों ने व्हाइट हाउस को वह कूटनीतिक शक्ति प्रदान की है जिससे वह काफी दिनों से टाले जा रहे अस्त्र-बिक्री समझौते को बीजिंग की अपेक्षाकृत कम नाराज़गी के साथ आगे बढ़ा सकता है। ओबामा की तायवान नीति के प्रति प्रश्न उठ रहे हैं, विशेषकर इसलिये भी कि उनके सामने एफ-१६ विमानों और पन्नडुब्बी की बिक्री का विकल्प रहेगा जिसे राष्ट्रपति बुश ने टाल दिया था। हमें आगामी प्रशासन के इस यथा-स्थिति को बदलने का कोई विशेष कारण नहीं दिखाई पड़ता। फिर भी, दीर्घकालीन राजनीतिक और सामरिक गतिमयता के प्रभाव में यह सारे सवाल राष्ट्रपति के पहले कार्यकाल के दौरान उठ सकते हैं। चेन यी की यात्रा के दौरान हुये भारी विरोध प्रदर्शन से संकेत मिलता है कि एकीकरण के सवाल पर तायवान दो हिस्सों में बटता जा रहा है। लेकिन एकीकरण उससे होने वाले आर्थिक लाभों पर निर्भर करेगा। यदि एकीकरण के लिये समर्थन ख़त्म होता है तो तनाव बढ़ सकता है। लेकिन अगर एकीकरण के प्रति रूझान जारी रहती है तो किसी सामरिक समझौते से प्रभावित तायवान वाशिंगटन को अपने क्षेत्रीय सैनिक अवस्था के पुनर्मूल्यांकन के लिये बाध्य कर सकता है। 

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