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ओबामा प्रशासन: कहां विदेश नीति बदलेगी

Published on: November 16th 2008 22:55:14
 आतंकवाद-विरोध और राजनीतिक परिवर्तन के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम में सहयोग की रणनीति पर आधारित मध्यपूर्व में अमरीकी कूटनीतिक और सैनिक प्रतिबद्धता बुश प्रशासन की स्पष्ट धरोहर रहेगी। यही स्थान ओबामा के लिये बदलाव का भी है जैसा कि इराक युद्ध से स्पष्ट होता है। ओबामा शुरु से ही इराक युद्ध के यह मान कर विरोधी रहे हैं कि यह ९/११ के बाद आतंकवाद-विरोधी मिशन में एक व्यवधान है। राजनीतिक और रणनीतिक तौर पर, इराकी सरकार का पतन नये प्रशासन के लिये विनाशकारी सिद्ध होगा। इसलिये, वे क्षेत्रीय अमरीकी कमांडरो की राय से बग़दाद में राजनीतिक माहौल में स्थायित्व लाने के प्रयास करेंगे जोकि स्थानीय सैनिको द्वारा अमरीकी लड़ाकू दस्तों का स्थान ग्रहण करने पर आधारित होगा।  इराक से लड़ाकू बलों की वापसी के मूल में भी अफ़ग़ानिस्तान की विगड़ती हुई स्थिति ही है। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ने अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामी घेरेबंदी और अंततोगत्वा उसके दमन को ही मूल अमरीकी सामरिक प्राथमिकता बताया है। वे पहले ही वहां दो अतिरिक्त ब्रिगेडों की तैनाती और एक अरब डालर की आर्थिक सहायता का बचन दे चुके हें। वर्तमान अमरीकी नीति की पूरी सामरिक समीक्षा के जारी होने के बाद ही ओबामा सरकार की नीतियां सामने आयेंगी। लेकिन यह स्पष्ट है कि हर एक नीति पाकिस्तान के सीम‍ावर्ती क्षेत्र में तालिबान की जारी गतिविधियों के व्यापक नतीजों को ध्यान में रख कर बनाई जायेंगी। हमारी राय है कि सैन्य शक्ति पर ज़ोर, पाकिस्तान की राजनीतिक कमज़ोरी और नये राष्ट्रपति के अफ़ग़ानिस्तान में प्रस्तावित उलझाव को देखते हुये नये प्रशासन में वर्ष २००९ में तालिबान के उदारवादी सदस्यों से से एक बहुत ही केन्द्रित लेकिन निम्न-स्तर की वार्ता शुरु हो सकती है। नये राष्ट्रपति का ईरान के प्रति रवैया काफी अनिश्चित सा है। चुनाव अभियान के दौरान ओबामा ने ईरान को परमाणु अस्त्र निर्माण बंद करने के लिये राज़ी कराने की नीयत से उस पर प्रतिबंध लगाने और सीधी तथा सख़्त कूटनीति अपनाने का वचन दिया था। दोनों के मध्य तनाव में किसी प्रकार की वृद्धि इराक के स्थायित्व पर बुरा प्रभाव डाल सकती है। जैसा कि हमने पहले ही संकेत दिया था, वाशिंगटन में कुछ विश्लेषक यह समझते हैं कि यह स्थिति नये राष्ट्रपति को किसी बडे़ लेन-देन के लिये प्रोत्साहित कर सकती है। लेकिन यह कार्रवाई वाशिंगटन के खाड़ी स्थित सहयोगी देशों के हित के विपरीत जायेगी। यह देश ईरानी प्रभाव से घबराते हैं। अगले प्रशासन के ईरान के प्रति रवैया का इज़्रायल और फ़िलिस्तीनियों के साथ संबंधों पर भी असर पड़ेगा। इज़्रायल की कदीमा पार्टी की नेता तिज़पी लिवनी पहले ही हमास और हैज़बुल्ला की तरफ कूटनीतिक हाथ बढ़ाने के विरुद्ध चेतावनी दे चुकी हैं। इसके अतिरिक्त, अगर ईरान के परमाणु कार्यक्रम के संबंध में कोई बड़ा परिवर्तन होता है तो तेल-अवीव द्वारा एकतरफ़ा कार्रवाई का जोखिम बढ़ जायेगा। शांति प्रक्रिया के मोर्चे पर, ओबामा ने हाल ही में संकेत दिया है कि वे बातचीत द्वारा दो राज्यों के निर्मान पर आधारित समझौते को प्राथमिकता देते हैं। हम समझते हें कि यह नीति दूसरे पक्ष के वार्ताकारों के स्वभाव और उनकी उन अन्य तात्कालिक राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों पर काबू पाने की क्षमता पर निर्भर करेगी जिसके लिये उन्हें चुनाव में भारी जनादेश प्राप्त हुआ है।

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