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तुर्की: इक भूला बिसरा साथी

Published on: April 22nd 2007 21:44:31
पारम्परिक तौर पर अमरीका और तुर्की मित्र राष्ट्र रहे हैं। अमरीका, तुर्की के योरोपीय संघ में शामिल होने और उसके अलगाववादी कुर्दिश आंदोलन के विरुद्ध अभियान जैसे तुर्की के उद्देश्यों का पूरा समर्थन करता था। दोनों देशों के संबंधों में गिरावट २००३ में उस समय आई जब तुर्की ने अमरीका को अपने यहां से इराक पर हमला करने की आज्ञा देने से इंकार कर दिया। वर्ष २००६ के मध्य में अमरीका ने नेटो के पूर्व  सुप्रीम कमांडर जनरल जोसेफ़ रालस्टन को तुर्की के लिये राष्ट्रपतीय दूत नियुक्त करके इन संबंधों को सुधारने का प्रयास किया था। इधर पी० के० के० उग्रवादियों द्वारा आठ तुर्की सैनिकों की हत्या के बाद, अमरीकी अधिकारी तुर्की के उत्तरी इराक के कुर्दिश शासित क्षेत्र, कुर्दिस्तान में, हस्तक्षेप की बढ़ती हुई संभावना को लेकर काफी चिंतित हैं। विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने हमें बताया कि जैसे जैसे हम इराक समस्या से जूझते जा रहे हैं, तुर्की के कुर्दिस्तान के भविष्य और किरकुक में तुर्की हित हमारी आंखों से ओझल होते जा गये हैं। तुर्की की कार्यवाहियां वहा अस्थिरता का एक नया मोर्चा खोल सकती हैं। तुर्की से संबंधों में शांति लाने के प्रयास कर रहे अमरीकी अधिकारियों के लिये आर्मिनिया नरसंहार पर प्रतिनिधि सभा में अप्रैल में होने वाली बहस के रूप में एक नई समस्या खड़ी होगी। अगर उसमें प्रस्ताव पारित हो जाता है तो अमरीका और तुर्की के संबंधों में और तनाव आयेगा। १९१५ में तुर्की में भारी संख्या में आर्मिनियाई लोग मारे गये थे। प्रस्ताव में इन हत्यायों को नरसंहार करार दिया गया है। प्रशासन के अधिकारी डैमोक्रैटिक नेताओं को इस प्रस्ताव पर मतदान न कराने की लिये राज़ी करने की कोशिश कर रहे हैं। वरना व्हाईट हाऊस के एक अधिकारी ने कहा, तुर्की से हमारी किसी बात को मनवाने की क्षमता गंभीर रुप से कम हो जायेगी। इसके नतीजे न केवल इराक बल्कि ईरान, काकेशस और कैस्पियन से होने वाले ऊर्जा निर्यात के लिये भी बहुत गं‍भीर होंगे।

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